21 नवंबर 2025 से लागू हुए चार नए श्रम कोड, 29 पुराने कानूनों की जगह ली

21 नवंबर 2025 से लागू हुए चार नए श्रम कोड, 29 पुराने कानूनों की जगह ली
24 नवंबर 2025 0 टिप्पणि आर्य वरदान नागपाल

21 नवंबर 2025 को भारत ने अपने श्रम कानूनों को जड़ से बदल दिया। श्रम और रोजगार मंत्रालय ने चार नए श्रम कोड लागू किए — वेतन कोड 2019, औद्योगिक संबंध कोड 2020, सामाजिक सुरक्षा कोड 2020 और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य की दशाएँ कोड 2020 — जिन्होंने 29 पुराने कानूनों को एक सुसंगठित, सरल ढांचे में बदल दिया। यह बदलाव सिर्फ कागज़ी अपडेट नहीं है। यह लाखों श्रमिकों की रोज़मर्रा की जिंदगी, नौकरी की सुरक्षा और वेतन संरचना को बदल रहा है।

किन श्रमिकों को मिली नई सुरक्षा?

इस बार पहली बार, डिजिटल युग के नए श्रमिकों को कानूनी दर्जा मिला है। गिग वर्कर, प्लेटफॉर्म वर्कर (जैसे ज़ोमैटो, डिलीवरी बॉय, उबर ड्राइवर), फिक्स्ड-टर्म वर्कर और अंतर्राज्यीय प्रवासी श्रमिक — अब इन सबको श्रम कानूनों का पूरा फायदा मिलेगा। यह बड़ा कदम है, क्योंकि पहले ये लोग अक्सर बिना किसी सुरक्षा के काम करते थे।

अब प्लेटफॉर्म कंपनियों को अपनी सालाना आय का 1-2% (अधिकतम 5% श्रमिकों को दिए गए भुगतान पर) सामाजिक सुरक्षा फंड में जमा करना होगा। इस फंड से उन्हें बीमा, पेंशन और अस्वस्थता के लिए लाभ मिलेंगे। यह भारत में पहली बार है जब डिजिटल अर्थव्यवस्था के श्रमिकों के लिए एक सार्वभौमिक सुरक्षा ढांचा बनाया गया है।

वेतन संरचना में बड़ा बदलाव: 50% बेसिक सैलरी

यहाँ एक ऐसा बदलाव है जिसकी वजह से लाखों कर्मचारियों की बैंक बैलेंस में अब थोड़ी बदलाव आएगा — कॉस्ट टू कंपनी (CTC) का अब 50% बेसिक सैलरी होना अनिवार्य है। इसका मतलब है कि अगर आपकी CTC ₹8 लाख है, तो अब आपकी बेसिक सैलरी ₹4 लाख होगी। बाकी ₹4 लाख डीए, HRA और अन्य भत्तों में बँटेंगे।

लेकिन यहाँ ट्विस्ट है: बेसिक सैलरी बढ़ने से PF (प्रोविडेंट फंड) और ग्रेच्युटी की रकम भी बढ़ जाएगी — जो कंपनी और कर्मचारी दोनों द्वारा जमा की जाती है। इसके नतीजे में, कई कर्मचारियों का टेक-होम पे कम हो सकता है। एक अनुमान के मुताबिक, ₹50,000 प्रति महीने के वेतन वाले कर्मचारी का मासिक हाथ में आने वाला पैसा ₹2,000-₹3,000 तक कम हो सकता है।

कंपनियाँ इसे लागू करने के लिए अपने पेट्रोल और HR सिस्टम बदल रही हैं। बीडीओ के अनुसार, अब नौकरी के ऑफर लेटर्स में CTC की विस्तृत ब्रेकअप जरूरी हो गई है।

रिट्रेंशमेंट और रिस्किलिंग फंड: नए नियम, नई जिम्मेदारी

अब कंपनियाँ 300 से अधिक कर्मचारियों को बर्खास्त करने या बंद करने के लिए सरकारी मंजूरी लेने के लिए बाध्य हैं — पहले यह सीमा 100 थी। इसका मतलब है कि छोटे और मध्यम आकार की कंपनियाँ अब अपने कर्मचारियों को आसानी से निकाल नहीं सकतीं।

लेकिन जब भी रिट्रेंशमेंट होता है, तो कंपनी को एक रिस्किलिंग फंड में प्रत्येक कर्मचारी के लिए 15 दिन के अंतिम वेतन की रकम जमा करनी होगी। यह फंड उन श्रमिकों के लिए है जिन्हें नए कौशल सीखने की जरूरत है। यह एक अहम बदलाव है — बस नौकरी छीनना नहीं, बल्कि उन्हें फिर से बाजार में लाना भी जिम्मेदारी है।

महिला श्रमिकों के लिए नई आजादी

अब महिलाएँ रात के शिफ्ट में काम कर सकती हैं — लेकिन सावधानियों के साथ। श्रम मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि रात के शिफ्ट में काम करने के लिए महिलाओं की सहमति जरूरी है। साथ ही, ट्रांसपोर्ट, लॉकर, बीमा और आपातकालीन सुरक्षा की व्यवस्था कंपनी की जिम्मेदारी है।

यह बदलाव उन महिलाओं के लिए बड़ी खुशखबरी है जो शहरों में नौकरी करना चाहती हैं लेकिन रात के शिफ्ट की वजह से डरती थीं। अब यह अधिकार नहीं, बल्कि एक सुरक्षित विकल्प बन गया है।

प्लांटेशन और बीडी श्रमिकों को मिला नया दर्जा

प्लांटेशन और बीडी श्रमिकों को मिला नया दर्जा

पहले जिन लोगों को ‘अनसंगठित क्षेत्र’ के अंतर्गत रखा जाता था — जैसे चाय बागान के मजदूर, बीडी बनाने वाले — अब उन्हें पूरी तरह कानूनी ढांचे में शामिल किया गया है।

अब हर बीडी श्रमिक को न्यूनतम वेतन निश्चित है। दिन में 8-12 घंटे काम करना अधिकतम है, और ओवरटाइम के लिए दोगुना वेतन। एक साल में 30 दिन काम करने के बाद बोनस भी मिलेगा। प्लांटेशन श्रमिकों को अब 180 दिन काम करने के बाद वार्षिक छुट्टियाँ मिलेंगी।

क्या कह रहे हैं श्रम संघ और विशेषज्ञ?

सरकार कहती है कि यह सुधार व्यापार को आसान बनाएगा और निवेश बढ़ाएगा। लेकिन श्रम संघों की चिंता है — क्या ये नियम छोटे उद्यमियों के लिए बोझ नहीं बन जाएंगे? क्या फिक्स्ड-टर्म नौकरियाँ अस्थायी नौकरियों का नया नाम बन जाएंगी?

खैतन एंड को के विश्लेषण के मुताबिक, डिजिटल कंप्लायंस पोर्टल लागू होने से कंपनियों के लिए नियमों का पालन आसान होगा। लेकिन यह तभी होगा जब राज्य सरकारें इन्हें व्यावहारिक रूप से लागू करें। अभी तक कई राज्यों ने अपने नियम जारी नहीं किए हैं।

अगले कदम: अभी भी कई सवाल खुले हैं

श्रम कोड्स का लागू होना सिर्फ शुरुआत है। अब तक बहुत सारे सवाल अनसुलझे हैं। क्या गिग वर्कर्स के लिए फंड की रकम वास्तव में उनके लाभों तक पहुँचेगी? क्या छोटे उद्यमी इतनी बड़ी लागत उठा पाएंगे? क्या महिलाओं को रात के शिफ्ट में काम करने का वास्तविक विकल्प मिलेगा, या यह बस एक नियम ही रह जाएगा?

एक चीज़ स्पष्ट है — भारत का श्रम व्यवस्था अब एक अलग दौर में है। जो लोग आज बिना किसी सुरक्षा के काम कर रहे हैं, उनके लिए यह बदलाव जिंदगी बदल सकता है। लेकिन यह सब सिर्फ नियमों के नहीं, बल्कि उनके कार्यान्वयन पर निर्भर करेगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्रम कोड्स के तहत गिग वर्कर्स को क्या लाभ मिलेंगे?

गिग वर्कर्स को अब सामाजिक सुरक्षा फंड के तहत बीमा, पेंशन और अस्वस्थता के लिए लाभ मिलेंगे। प्लेटफॉर्म कंपनियाँ अपनी वार्षिक आय का 1-2% (अधिकतम 5%) इस फंड में जमा करेंगी। यह फंड आधार से लिंक होगा, ताकि श्रमिक अपने लाभ को किसी भी जगह तक ले जा सके।

50% बेसिक सैलरी का मतलब क्या है और मेरा हाथ में पैसा कम क्यों होगा?

CTC का 50% अब बेसिक सैलरी होगा, जिससे PF और ग्रेच्युटी बढ़ जाएगी — जिसका हिस्सा आप और कंपनी दोनों देते हैं। इसके नतीजे में टेक-होम पे कम हो सकता है। उदाहरण के लिए, ₹50,000 CTC वाले कर्मचारी का हाथ में आने वाला पैसा ₹2,000-₹3,000 तक कम हो सकता है, लेकिन उसकी भविष्य की सुरक्षा बढ़ जाएगी।

क्या छोटे उद्यमी इन नियमों को लागू कर पाएंगे?

यह बड़ी चुनौती है। छोटे उद्यमियों को नए वेतन संरचना, रिस्किलिंग फंड और ऑनलाइन कंप्लायंस पोर्टल का खर्च उठाना होगा। सरकार ने तीन महीने का ग्रेस पीरियड दिया है, लेकिन अभी तक कोई विशेष आर्थिक सहायता नहीं घोषित की गई है।

राज्य सरकारें इन कोड्स को कैसे लागू कर रही हैं?

केंद्रीय कोड्स को लागू करने का अधिकार राज्यों को है। अभी तक केवल 12 राज्यों ने अपने नियम जारी किए हैं। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और तमिलनाडु ने जल्दी किया है, लेकिन बिहार, झारखंड और ओडिशा अभी तक रुके हुए हैं। इसकी वजह से देश भर में लागू होने में असमानता आ सकती है।

महिलाओं के लिए रात के शिफ्ट का नियम असली सुरक्षा देगा या बस एक नियम होगा?

नियम तो है, लेकिन लागू होगा या नहीं — यह अलग सवाल है। कंपनियों को ट्रांसपोर्ट, लॉकर, लाइटिंग और आपातकालीन सुरक्षा की व्यवस्था करनी होगी। अगर यह नहीं हुआ, तो यह नियम कागज़ पर ही रह जाएगा। श्रम संघ अब निगरानी के लिए जांच टीम बनाने की मांग कर रहे हैं।

क्या ये कोड्स नौकरियाँ बढ़ाएंगे या नौकरियाँ कम करेंगे?

सरकार का दावा है कि ये कोड्स निवेश बढ़ाएंगे, जिससे नौकरियाँ बढ़ेंगी। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि अगर छोटे उद्यमी लागत बढ़ने की वजह से रोजगार कम कर दें, तो नौकरियों में कमी आ सकती है। अभी तक नौकरियों पर कोई आंकड़ा नहीं आया है — लेकिन अगले 6 महीने में यह बहुत स्पष्ट हो जाएगा।